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Thursday, August 10, 2017

जो खो गया है


   
मनोज पटेल. एक नाम भर नहीं है यह शख्स हमारी ज़िन्दगी में. बहुतों की तरह मैं भी न सिर्फ इनका कायल हूँ बल्कि बेहद शुक्रगुज़ार भी. फेसबुक जैसी आभासी दुनिया से जो मैंने पाया है उसमें सबसे अनमोल है इस शख्स का ब्लॉग – पढ़ते-पढ़ते. और इतने ही अनमोल थे मनोज पटेल. विश्व कविता से परिचित कराने वाले एक संजीदा गाइड थे मनोज. न जाने कितने कवियों को आप ही के मार्फ़त जान पाया. आप नहीं होते तो मेरे लिए दुनिया के बहुत सारे कवि नहीं होते, नहीं होतीं उनकी कवितायें..मैं भी न होता ऐसा जैसा आज हूँ. मेरे जैसे कई अनपढ़-कुपढ़ लोगों को आपने कविता की सही तमीज सिखाई. बेहद प्यार से हर सुबह एक नई कविता हमरे सिराहने छोड़ जाते थे. आँख खुलते ही जैसे एक नई दुनिया खुल जाती थी. उसके मार्फ़त हम कई-कई देशों के लोगों के साथ दुखी हुए, खुश हुए, नाचा किए और अंत में तन कर खड़े हुए उनके साथ. आपने इतने प्यार और अपनेपन से दुनिया भर की भाषा वालों की भावनाएँ हम तक पहुंचाई कि हम उनसे प्यार किए बिना नहीं रह पाए. जिस तरह डूबकर आपने किया अनुवाद  उसी तरह हमें सिखाया थोड़ा और डूबकर प्यार करने का सलीका.
     अभी आठ दिन पहले ही हम सबने आपका फिर से स्वागत किया था और आभार जताया था. हम बेहद खुश थे आपके लौट आने से. फिर से. हमारी उम्मीद के पंख उगने शुरू हो गए थे  हमें क्या पता था कि जो ‘ऐनक’ हमें आप दे रहे थे वो असल में हमारे लिए छोड़े जा रहे थे. कि उसी ऐनक की जरुरत हमें पड़ेगी और हम सचमुच समझ पाएंगे उसकी व्यर्थता को. कि सचमुच समझ पाएंगे कविता की उस  प्रक्रिया को जिससे एक कवि और फिर उसके अनुवादक को गुज़रना पड़ता है. इसका कुछ – कुछ अंदाज़ा तो मुझे उस दिन हो गया था जब पहली और आखिरी बार आपके ब्लॉग पर जा कर राईट क्लिक करने की धृष्टता कर दी थी. संग-संग समझ में आया कि यह एक मिशनरी अनुवादक की लगन और उसकी निष्ठा का अपमान है. उस दिन ग्लानि से भर आया था मन . आपने मेरी हडबडाहट और मेरे जल्दी में होने पर ब्रेक लगाया था . कविता जिस संजीदेपन और ठहरकर परिचय करने की माँग करती है, शायद उसे थोड़ा-थोड़ा समझ पाया था उस दिन. कोई राईट क्लिक नहीं, सेलेक्ट-कॉपी-पेस्ट नहीं. या तो कवितायें पढ़ी जा सकती हैं, उतारी जा सकती हैं लगन से  या फिर उतने ही आग्रह से दूसरों को सुनाई और पढवाईं जा सकती हैं.
     आपसे एक बात पर्सनली मिलकर कहना चाहता था. आपकी वजह से पहली बार मैंने खासी कीमत देकर किसी कवि का संग्रह ख़रीदा था. आज वह कवि मेरा सर्वाधिक पसंदीदा कवि है, हमेशा साथ चलता है. सोचा था कभी आपसे मिलवाऊंगा उसे. आप उसे मेरे साथ देखकर और यह जानकर कि आपकी वजह से हम आज साथ हैं, जरूर प्यार से भर गए होते. बहुतों की तरह मेरी भी बहुत सी बातें अनकही ही रह गईं. एक मेल तक नहीं लिख पाया आपको. ठीक से मुखातिब ही नहीं हो पाया आपसे. एक दावा लेकिन जरूर कर सकता हूँ आप होते तो आपके सामने विनम्रता से कहता कि मुझे जानने वालों में बहुत कम ही करीबी होंगे जो ‘पढ़ते-पढ़ते’ से परिचित नहीं होंगे...जिन्होंने आपके जज्बे को सराहा न होगा.
     अभी तो कितना कुछ होना था. कितने भाषाओं के लोगों के दुःख और नेह से जुड़ना था. बाकी था कितने देशों के कितने अनुभवों से गुजरना. हम आपकी रवानगी के कायल थे मनोज भाई. इसके बावजूद आप जितना कर गए हैं, जो पीछे छोड़े जा रहे हैं, वह भी अपने आप में मुकम्मल है. आप मेरे जैसे कईयों की दुनिया में आये तो अचानक से पर गए नहीं. जा भी नहीं पाएंगे, हम जाने नहीं दे पायेंगे आपको...
आपकी अनुवादित यह आखिरी कविता काश आखिरी कहलाने का हक खो देती...
ऐनक – वेरा पावलोवा
                  (अनुवाद –मनोज पटेल, http://padhte-padhte.blogspot.in/)
ऐनक? किसको पड़ी है उनकी
वे धुंधला जाते हैं चुम्बन के समय
रगड़ खाते हैं पलकों से
गंध और आवाज़ को कर देते हैं मंद
आंसुओं को भटका देते हैं रास्ते से... 
और किसी काम नहीं आते जब आप तलाश रहे होते हैं उसे 
जो खो गया है. 
सलाम
   

Monday, August 15, 2016

आज़ादी










आपने देखा
दिल्ली में
चेन्नई -गुवाहाटी में
राजकीय झाँकियों में
मैंने देखा
साइकिलों में
रिक्शों में
ऑटो में 
ट्रकों और ट्रालियों में
तिरंगे को 
लहराते हुए

बिखरी पड़ी थीं 

खुशियाँ
चौराहे और गलियों में
खुशी से सारे
मुस्काती थीं
मुस्काते थे
मजहबों-जातियों के पार जा

खुश थे सभी 

बूढ़े और बच्चियाँ
जवान और लड़कियाँ
चारों ओर शोर था
देशभक्ति गानों का
जोश से भरे थे मोड़ 
रास्तों में उल्लास था


क्या ही होता नज़ारा
कैसे उमग के लहराता तिरंगा
अगर सचमुच में होते
आज़ाद तो
हर हाथ को मिलता काम
हर आँख को मिलता आराम तो...


(राजीव राही, 15.08.2016)

Friday, July 1, 2016

संताल हूल

झारखण्ड से प्रकाशित होने वाले अख़बारों को देख कर ऐसा लगा कि संताल हूल के इतिहास से हम अब कमोबेश परिचित हैं. सरकारी विज्ञापन और आयोजनों से भी यही आभास मुझे मिला. झारखण्ड के बाहर और खुद झारखण्ड के संताल परगना क्षेत्र के बाहर के लोग संताल हूल से असल में कितना वास्ता रखते हैं, यह कहना अब भी मुश्किल है. संताल हूल देशी दासता और औपनिवेशिक गुलामी के खिलाफ लड़ी गई पहली सुचिंतित और संगठित लड़ाई थी. मार्क्स ने भी संताल हूल को आमलोगों के नेतृत्व में लड़ा गया औपनिवेशिक भारत का पहला संगठित जन युद्ध कहा था. 30 जून 1855 को झारखण्ड के वर्तमान साहिबगंज जिले के बरहेट प्रखंड के भोगनाडीह गाँव में हूल का आगाज़ हुआ था. ‘उच्च जाति’ के महाजनों तथा जमींदारों के भीषण अत्याचार के खिलाफ सिदो, कान्हू, चाँद, भैरव और उनकी जुड़वाँ बहन फूलो और झानो के प्रयास से 10000 आदिवासी एवं गैर आदिवासी लोगों ने भोगनाडीह गाँव में इकट्ठा होकर संघर्ष छेड़ने का फैसला किया था. धीरे-धीरे यह जन-युद्ध 60000 लोगों का आन्दोलन बन गया. सिदो मुर्मू , कान्हू मुर्मू, चाँद मुर्मू और भैरव मुर्मू को सबने सर्वसम्मति से अपना नेता स्वीकार किया था. पहले तो ये लड़ाई स्थानीय महाजनों और ज़मींदारों के खिलाफ थी लेकिन धीरे-धीरे यह देशी रियासतों और अंग्रेजों के खिलाफ भी हो गई. 30 जून 1855 से 3 जनवरी 1856 तक चली इस लड़ाई का अग्रेजों ने निर्ममता से दमन किया. पहले मार्शल लॉ लगाया गया, फिर टैंकों और हजारों सैनिकों की मदद से संताल हूल के लड़ाकों का कत्लेआम किया. उनके फौजी बंदूकों और तोपों के सामने संतालों के तीर-धनुष एवं अन्य पारंपरिक हथियार टिक नहीं पाए और लगभग 15000 लोग इसमें मारे गए. सैकड़ों गाँव उजाड़ दिए गए. मारे गए लोग अपने मूल अधिकारों के लिए लड़ते हुए शहीद हुए. वे अपनी जमीन पर अपना हक़ चाहते थे. मेरी और आपकी तरह खुशियों और गीतों से भरी ज़िन्दगी चाहते थे. इसलिए वे शोषण करने वाले महाजनों और जमींदारों के अत्याचार से मुक्ति चाहते थे. अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति चाहते थे. विडंबना है कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में संताल हूल को भुला देने के सायास प्रयास हुए. उल्लेख भी किया गया तो महज दो पंक्तियों तक ही सीमित कर दिया गया.
       यद्यपि इनके द्वारा छेड़े गए जनयुद्ध को बहुत बर्बरता से कुचल दिया गया फिर भी उनके ज़ज्बे और बराबरी का समाज बनाने की चाहत को कुचला नहीं जा सका. उस समय कार्यरत एक ब्रिटिश ऑफिसर मेजर जेर्विस ने संताल हूल के दौरान संतालों के कत्लेआम और उनके ज़ज्बे के बारे में लिखा- “यह कोई युद्ध नहीं था; वे समपर्ण करना जानते ही नहीं थे. जब तक उनके नगाड़े बजते थे, उनका पूरा समूह डटा रहता और मारे जाने के लिए तैयार रहते थे. उनके तीरों ने प्रायः हमारे लोगों को मारा इसलिए हमें तब तक फायर करना पड़ता था जब तक कि वे डटे रहते थे. जब उनके नगाड़ों को जब्त कर लिया जाता तो वे कुछ दूर पीछे हट जाते. फिर जैसे ही नगाड़े की आवाज़ गूंजने लगती वे पुनः लड़ने के लिए खड़े हो जाते, जब तक कि हम वापस आकर उन पर बारूद की बौछार नहीं कर देते. इस युद्ध में शामिल ऐसा एक भी सिपाही नहीं था जो अपने आप पर शर्मिंदा नहीं था. (L.S.S O Malley, Bengal District Gazetteers Santal Parganas)
       आज भी अगर उन इलाकों को देखें जहाँ हूल का आगाज़ हुआ तो हम पाएंगे की आजाद भारत और अलग हुए झारखण्ड में भी स्थिति बहुत नहीं बदली है. आज भी वहाँ की अधिकांश जनता औपनिवेशिक काल में ही रह रही हैं. उच्च जाति के महाजनों का आज भी बोलबाला है. प्रशासनिक लापरवाही का तो पूछना ही क्या ? इसलिए हर साल मनाये जाने वाले हूल दिवस को महज एक रस्म अदायगी तक सीमित करना काफी नहीं है. यह समझने एवं बताये जाने की जरूरत है कि संताल हूल कोई हड़बड़ी में फूट पड़ा या स्वतः स्फुट हुआ विद्रोह नहीं था बल्कि एक सुचिंतित और सुसंगठित जनयुद्ध था. तमाम सलाह-मशवरे के बाद ही शोषक और शासकों के खिलाफ एक अंतिम लड़ाई का निर्णय लिया गया. इसमें आम जनता के शत्रुओं की पहचान की गई थी. उन अत्याचारी नीतियों पर विचार किया गया था जिससे यह क्षेत्र महाजनों और जमींदारों से होता हुआ अंग्रेजों की गिरफ्त में जा रहा था. इस जन युद्ध की ही कामयाबी थी कि अंग्रेजों को आगे चल कर संताल परगना टेनेंसी एक्ट बनाने को मजबूर होना पड़ा.      
       यह जन-युद्ध एक दिलचस्प विवाद को सुलझाता भी है. आज एक बहस है कि दलितों और आदिवासियों के बीच कोई एकता हो सकती है या नहीं ? आंबेडकर के रास्ते आदिवासी की मुक्ति संभव है या नहीं ? हूल दिवस यह साबित करता है कि लोगों और उनके नेतृत्व में अपने शत्रु पक्ष को ठीक-ठीक पहचानने की समझ है तो यह संभव है. जिस ‘उच्च जाति’ के महाजनों और जमींदारों के खिलाफ उन्होंने हूल का आह्वान किया था उसमें उस क्षेत्र के दलित और अन्य पिछड़ी जाति के लोग भी शामिल हुए थे. उत्पीड़ित गैर आदिवासी लोगों ने भी सिदो, कान्हू, चाँद और भैरव को अपना नेता स्वीकार किया था. 30 जून को भोगनाडीह की सभा में तमाम आदिवासी प्रतिनिधियों के साथ मंगलू जुलहा, सीरू चमार, सीलू नाई, गनपत ग्वाला, जगरनाथ सिकदर आदि जैसे प्रतिनिधि भी शामिल हुए थे. भारतीय इतिहास का यह पहला संघटित जनयुद्ध हमें आगे बढ़ने का ज़ज्बा भी देता है और रास्ता भी दिखाता है. सवाल है कि हम वर्ग और जाति की अपनी अपनी पताका को लहराने की होड़ से बाहर निकलना चाहते हैं या नहीं ? यह जनयुद्ध बराबरी के संघर्ष का पहला महत्वपूर्ण पाठ है जिसे सायास उपेक्षित किया गया. आज जरूरत संताल हूल की उस विश्वदृष्टि की है जो शोषक और शासक वर्ग तथा उसके हिमायतियों की सही पहचान करवा सके. जनता को उनके संकीर्ण अस्मिता से बाहर निकाल कर संघटित कर सके. एक ऐसा नेतृत्व दे सके जो जनता और जंगल दोनों के प्रति संवेदनशील हो.
हूल जोहर!!!



Wednesday, June 29, 2016

'वह' (केदारनाथ सिंह)

इतने दिनों बाद
वह इस समय ठीक
मेरे सामने है

न कुछ कहना
न सुनना
न पाना
न खोना
सिर्फ़ आँखों के आगे
एक परिचित चेहरे का होना
होना-
इतना ही काफी है

बस इतने से
हल हो जाते हैं
बहुत-से सवाल
बहुत-से शब्दों में
बस इसी से भर आया है लबालब अर्थ
कि वह है

वह है
है
और चकित हूँ मैं
कि इतने बरस बाद
और इस कठिन समय में भी
वह बिल्कुल उसी तरह
हँस रही है

और बस
इतना ही काफी है

Friday, December 14, 2012

बातें


      (१)
बातों का थम जाना
रुकना होता है साँसों का
बातों का खत्म होना
उस सिलसिले को काट देता है
जन्म से ही हम जिससे नाभिनालबद्ध होते हैं
बातें खत्म होने से
माँस और खून का स्वाद चला जाता है
अस्थि-मज्जा बेजान हो जाते हैं
कि शिकारी कुत्तों तक की
दिलचस्पी खत्म हो जाती है हममें
बातें खत्म इसलिए नही होतीं
कि सिलसिले को जारी रखा जा सके
जिया जा सके बहने की तरह
बातों का होना किसी का होना होता है
किसी का जीना होता है हमारी वजह से


          (२)
बातें होती हैं
पर हम कह नहीं पाते
डरते हैं कि जुबान से ढुलककर
कहीं खो न दे अपना नमक
असल में जब बोल नहीं पाते
तब बेचैनी से ढूँढ रहे होते हैं सही तरीका
उसे कहने का  
जैसे सद्य जन्मा बच्चा बोल नहीं पाने के कारण
रोना शुरू कर देता है  
हम भी जब नहीं बोल पाते
तब रो रहे होते हैं
पर डरते हैं
कहीं आँखों से ढुलककर
स्वाद खो न दे अपना  
     


   (३)
बातें भी रोती हैं
कलपती-छटपटाती हैं
कराहती हैं
सिर पटककर जान दे देना चाहती हैं
जब वे खो देती हैं अपना असर
बेअसर होने का डर
मौत से भी पीड़ादायक होता है उनके लिए
पर ऐसा करती नहीं
वे कुरेद-कुरेद कर
अपनी केंचुली उतारती हैं
हासिल करती हैं नया रूप
अपने ही खिलाफ करके संघर्ष
झुठला देती हैं
वे बिसूरते रहने को



      (४)
कहते हैं
एक बार बोली गई बात
अनंत काल तक रहती हैं जिंदा
और इस तरह हम रहते हैं जिंदा
अनंत काल तक
अपने श्याम-सफ़ेद वजूद के साथ  


Saturday, June 2, 2012

'तुझे सब है पता मेरी माँ' कहना ही काफी नहीं है....



यह प्रश्न इधर कुछ दिनों से मुझे बहुत परेशान कर रहा है. हो ही सकता है कि मैं गलत सोच रहा हूँ और इसे यथाशीघ्र ठीक करने की जरुरत है. असल में इसलिए भी यह कहना चाहता हूँ ताकि साथियों के सही सुझाव से मैं अपनी सोच को ठीक कर सकूँ. यह बात एक बेहद संजीदा मामले को लेकर है, यह माँको लेकर है, असल में हमारे तत्कालीन भारतीय समाज में प्रचलित माँके कांसेप्ट को लेकर है. मतलब कि हम माँ को लेकर इतने भावुक  क्यों होते हैं ? क्यों कोई तर्क इसके आगे काम नहीं करता? (वैसे कई सारे मामले हमारे माँ के प्रति संजीदा होने को झुठलाते भी हैं लेकिन यह प्रसंग फिर सही). अभी तो उस माँकी ही बात चले जिसके कसम खा लेने भर से हम मान बैठते हैं कि सच बोला जा रहा है.

                             ऐसा क्या सिर्फ इसलिए है कि माँ हमें जन्म देती है, इसलिए हम माँ को इतना महत्व देते हैं? जबकि हम जानते हैं कि महज पैदा करने भर से ही माँ अपने बच्चों के सर्वाधक करीब नहीं होती. यह कोई जैविक या वैज्ञानिक कारण भी नहीं है माँ के अपने बच्चों से करीब होने का. मार्खेज ने ‘Love in The Time of Cholera’में  बिलकुल सही लिखा कि सिर्फ पैदा करने की वजह से ही माँ अपने बच्चों के करीब नहीं होतीं, बल्कि उनको पालने और बड़ा करने के क्रम में उनके बीच जो मित्रता विकसित होती है, उस कारण से अधिकांश बच्चे अपने माँ के करीब होते हैं’(ध्यान रहे सभी नहीं)...और इसलिए बड़े होने के क्रम में जिनका ध्यान पिता ज्यादा रखते हैं, वे बच्चे अपने पिता के ज्यादा करीब होते हैं. और इसी तरह से कई बच्चे अपने नाना, नानी, दादा, दादी या आया के ज्यादा करीब होते हैं. और अगर ऐसा नहीं होता तो अनाथ कहे जाने वाले बच्चे कभी खुश नहीं हो पाते, वो जिंदगी भर अपने पैदा  करने वाली माँ को ही तलाशते रहते.

                                      तो फिर माँ इतनी महत्वपूर्ण क्यों है? माँ हमें पल-पोष कर बड़ा करती है, हमारी हर पसंद-नापसंद का ख्याल रखती है, इसलिये हम माँ को इतना महत्व देते हैं? या हमें समय पर खाना बना कर खिलाती है, हमारे कपड़ों को, सामानों को जगह पर रखती है? या हर पल हमारे जरूरतों को पूरा करने के लिए नींद में भी तत्पर रहती है? या खुद परेशान हो कर भी, हमारी परेशानियों को दूर करती है? या फिर अपनी खुशियों से समझौता करके भी हमारी खुशी में ही अपनी खुशी को समाहित कर देती है, इसलिए ?

                                       अगर हमारी माँ ऐसी ना होती तो? अगर वो नौकरी करने जाती या बाहर काम करने जाती होती, तब भी क्या हमारे पुराने ग्रन्थ, हमारा साहित्य (समकालीन भी) माँ की इतने ही गुण गाते या माँ की करुणा, दया, ममता और महानता के गौरव गान से भरे होते ? उसका जीवन भी अगर तथाकथित मर्यादाओं से न बंधा होता, वो भी अगर पुरुषों की तरह नियमों से छूटलेती रहतीं, तो क्या तब भी माँ को इसी रूप में हम देखने को अभ्यस्त होते या हमें सायास अभ्यस्त बनाया जाता ? तो फिर कुंवारी माँ को वह अधिकार, सम्मान क्यों नहीं हासिल है जो एक विवाहित माँ को है? जबकि बच्चा तो हर हाल में माँ का ही होता है. जबकि एक कुंवारी माँ का संघर्ष और समर्पण किसी भी विवाहित माँ से ज्यादा ही होता है.

                                          मतलब कहीं कोई खोट है. मतलब कि यह भी पुरुष-सत्तात्मक समाज की एक निर्मिति है. यह भी पुरुषों की सत्ता को मनवाने का एक हथियार है. स्त्रियों को खुशफहमी में रखने का एक औज़ार है. स्त्रियों की स्वंत्रता को सीमित करने का ही एक तरीका है. माँ होने में ही सारी महानता को समाहित करके उसके आसपास चहारदीवारी चुनने का एक प्रयास ही  है. घर और बच्चों की सारी जिम्मेदारी को निभाने में ही स्त्री होने और माँ होने की सार्थकता क्या हमें किसी षड्यंत्र की बू नहीं देता ?
बातें तो मन में बहुत सारी हैं
, और सच कहूँ तो बातों से ज्यादा बौखलाहट है( और इसीलिए बातों को एक तारतम्य में नहीं कह पा रहाअसल में यह मेरे सोच के नोट्स ही हैं) कि हम व्यर्थ में ही माँको उसकी ममता के नाम पर इतना महत्व देते हैं. शायद इतनी  भावुकता की जरुरत नहीं थी, जिसमें दया और अहसान की ही मात्रा अधिक है; और जिसने स्त्री को गुलाम बनाने का ही काम ज्यादा किया है. फिर कई लोग सवाल करेंगे कि फिर बच्चे की परवरिश कैसे होगी? इसका सीधा सा हल है कि स्त्री-पुरुष को शुरू से इस जिम्मेदारी  को मिलकर उठाना चाहिए था. या अब भी ऐसा किया जा सकता है.(और हो भी रहा है येलेकिन फिर भी स्त्री माँ होने की महानता का बोझ वहाँ भी ढो रही है) अगर कोई यह पहले से ही मान बैठे कि स्त्री का ही काम घर पर रहना है, तो तर्क की कोई गुन्जाईस ही नहीं बचती.

                                         मेरे द्वारा अधिकांश पढ़ी गयी कवितायेँ माँ के माँ होने को ही गौरवान्वित करती हैं, उसकी ममता की महानता को, उसके जीवन की पीड़ा को, उसके बच्चों के लिए किये गए समर्पण को ही सिर्फ प्रस्तुत करती हैं, बेशक यह भी एक बड़ा काम है पर...इसके बाद? इसके बाद क्या? कि वो ऐसे ही पीढ़ी दर पीढ़ी माँबनी रहे. मुनव्वर राना का एक बहुत प्रसिद्ध शेर माँ को लेकर है और जिसकी कि हम सभी बहुत चर्चा करते हैं. उसे अभी कोई फेसबुक पर पोस्ट करके देखे, कमेंट्स का ढेर लग जायेगा और बताने की जरुरत नहीं कि किस प्रकार के कमेंट्स होंगे. बहरहाल शेर शायद कुछ इस प्रकार है

        “किसी के हिस्से में मकां आया किसी के हिस्से में दूकां आयी
         मैं घर में सबसे छोटा था मेरे हिस्से में माँ आयी
           क्यों आयी माँ हिस्से में? इसे समझने के लिए माँहोने के समाजशास्त्र को समझना होगा. वो अगर सबसे छोटे के हिस्से में नहीं आती तो भी किसी न किसी के हिस्से में जाती ही या जाना ही पड़ता. हमने माँ के पास विकल्प कहाँ छोड़े हैं. किसी ने उससे भी पूछा कि वो कहाँ जाना चाहती है...और शायद पूछें भी तो किसी एक बेटे के हिस्से में जाने की ही बात कहेगी. क्योंकि पेट्रीआर्कल हिजेमनी ने उसकी सोच को सदियों से माँ होने तक ही सीमित कर रखा है.और अगर छोटे बेटे के हिस्से में आयी और यही सबसे बड़ी खुशी की बात है, तो यह खुशी उसे क्यों है? कि माँ का साया उसके साथ होगा, उसके गम को, खुशियों को शेयर करेगी, और...और वह सब करेगी जो एक माँ के लिए पहले से तय है. अगर माँ कोई काम न करे सिर्फ घर में बैठकर अपने बच्चों से प्यार करे, तब भी क्या यह पुरुष-शासित समाज इतनी ही जयकार करेगा/करता माँ की?
                  इसलिए अब सबसे ज्यादा जरूरी है कि हम माँ को माँके तथाकथित कांसेप्ट से मुक्ति दिलाएं, छुटकारा दे दें उसे, ‘मेरे पास माँ है’  की मानसिकता से उबरें...विश्वास कीजिये माँसे मुक्त होकर ही  हमें असली माँ मिल पायेगी...तब हम सचमुच अपनी माँ से प्यार कर पाएंगे, उसका असली प्यार पाएंगे, तब उसे और हमारी दया की जरुरत नहीं होगी. तब और भी गर्व होगा किसी माँ की बेटी या किसी माँ का बेटा होने में. याद कीजिये गोर्की की माँको...

                                                                                 

Tuesday, February 14, 2012

उपवास के दिन
देर से मुँह धोने वालों को 
यह कोई हक नहीं बनता 
कि वे रात को खाली पेट सोये 
लोगों से कहें 
'सुबह उठते ही मुँह धोना चाहिए'

Sunday, January 8, 2012

प्रेम


(यह कविता लिखी नहीं, बोली गयी  है. इसलिए सुधीजनों को इसमें गुरुत्व और घनत्व का अभाव दिखाई दे और यह लाजिमी भी है. यह स्पोंतेनिअस है,अगर उसी समय इसे रिकॉर्ड न कर लिया गया होता तो बाद में इसे फिर से, उसी तरह से लिख पाना संभव नहीं हो पाता. मैंने थोड़े-बहुत मामूली सुधार के साथ इस कविता को यहाँ उसी रूप में दे दिया है जैसे इसे बोला गया था.और भी कुछ कवितायेँ ऐसी हैं जिसे मैं आप लोगों के सामने रखूँगा. कोशिश है कि उस रेकॉर्डिंग को भी इस ब्लॉग पर अपलोड कर सकूँ. कविता को फिर से उसकी परम्परा से जोड़ने का किंचित प्रयास है यह. धन्यवाद.)
चलो तुम मुझसे बहुत नाराज़ हो
सोचते हो कि हमेशा लड़ाई और संघर्ष की ही बात क्यों करता हूँ 
हमेशा चले  रहे इतिहास को बदलने की ही बात क्यों करता हूँ
तो चलो आज कुछ बातें प्रेम पर करता हूँ 

मैं अक्सर सोचता हूँ 
कि मैं प्रेम पर कुछ कहूँ
प्रेम पर कुछ लिखूं
तुम लोगों के साथ साझा कर सकूँ कुछ प्रेम की बातें 
पर प्रेम पर सोचते हुए 
मैं अक्सर सोचता हूँ 
कि ये प्रेम कैसे होता है 
क्यों होता है 
और किससे होता है

मेरे पड़ोस में रहने वाले कोई पंडिज्जी थे 
वे हमेशा कहते थे कि प्रेम हमेशा बराबरी वालों  से होता है 
तो प्रेम के लिए जरुरी है 
कि हम एक बराबरी के समाज का निर्माण करें 
प्रेम के लिए जरुरी है 
कि हम तुम एक दुसरे के समकक्ष  सकें 
एक दूसरे को बराबर समझ सकें 
मेरी तरफ से तो यह तैयारी पूरी है 
कि मैं तुमसे प्रेम की बातें करूँ या तुमसे कर सकूँ प्रेम 
तो क्या तुम भी इस बात के लिए तैयार हो 

अगर तुम शकुंतला के प्रेम की बात मुझसे करना चाहते हो 
तो मैं इस बात के लिए तैयार नहीं हूँ 
क्योंकि शकुंतला ने एक निश्छल प्रेम किया था
और उस निश्छल प्रेम का परिणाम पूरा इतिहास जानता है 
हम और तुम जानते हैं 
आने वाला भविष्य भी उसी इतिहास को दुहरायेगा

उस निश्छल प्रेम के परिणाम में
उसके पति ने उसे पहचानने से इंकार कर दिया
किसी ने कहा की वह बराबरी का प्रेम नहीं था 
शकुंतला एक जंगली लड़की थी 
मैं अक्सर सोचता हूँ 
कि यह जंगली शब्द मुझे इतना परेशान क्यों करता है 
और यह जंगली शब्द तुम्हे इतना 'प्रिय' क्यों है
ओह! फिर प्रेम के अन्दर एक जंगली शब्द  गया 
तुम कहोगे कि मेरा प्रेम जंगलीपन से भरा हुआ है 
हाँ! मेरा प्रेम जंगलीपन से भरा हुआ है 
क्योंकि जंगल में पैदा हुआ मैं आदमी 
हर चीज को जंगल की नजर से देखता हूँ 
अपनी जंगली नजर से ही मापता-तौलता हूँ 
क्योंकि जंगल में रहते हुए 
मेरी लड़ाई जिसके साथ है 
मेरा प्रेम भी उसी के साथ हुआ
संघर्ष और सखत्व के माध्यम से ही
हम अपना सारा इतिहास रचते आये हैं 

लेकिन चलो ठीक है
अगर तुम्हारे अनुसार मैं प्रेम की बाते कहूँ 
तो मैं क्या कह पाऊंगा
मैं दो चार शब्द कहूँगा
दो चार गीत गुनगुनाऊंगा
और कहूँगा 
कि मैं तुमसे इतना प्रेम करता हूँ 
जितना आज तक किसी ने किसी से नहीं किया 
पर मैं यह पहली बार तो नहीं कह रहा होऊंगा
इस तरह की बातें 
कई लोगों ने कई बार दोहराया होगा

तो चलो मैं तुम्हें
अपने अनुसार प्रेम की बातें बताता हूँ 
मैं अपने अनुसार प्रेम की बातों को तुम्हारे सामने रखता हूँ
मेरे लिए प्रेम का मतलब है बारूद की गंध
मेरे लिए प्रेम का मतलब है गोलियों की आवाज़
मेरे लिए प्रेम का मतलब है खून से लथपथ लाशें
मेरे लिए प्रेम का मतलब है जवान बेटे की लाश पर विलाप करता साठ साल का बूढ़ा बाप
मेरे लिए प्रेम का मतलब है भरोसे की एक बात को तरसते हुए लोग 
मेरे लिए प्रेम का मतलब है एक लाश के साथ अपने प्रेम का इजहार करना 
मेरे लिए प्रेम का मतलब है कि मैं अकेला ही करता रहूँ प्रेम और मैं जिससे करता हूँ प्रेम उसे कहीं मार दिया गया हो
मेरे लिए प्रेम का मतलब है एक दूसरे से ऐसे चिपट जाना जैसे अंतिम बार मिल रहे हों 
मेरे लिए प्रेम का मतलब है अपने ही जमीन से विस्थापित कर दिए गए लोग
मेरे लिए प्रेम का मतलब है एक अनवरत लड़ाई
मेरे लिए प्रेम का मतलब है कि सारी पृथ्वी में सभी खुशहाल हों 
मेरे लिए प्रेम का मतलब है कि कोई कभी किसी को दुःख  पहुंचाए
कभी किसी को जाति-धर्म के नाम पर
वर्ण के आधार पर दुखी  करे 
पर तुम्हारे लिए मेरे ये सारे प्रेम के आदर्श 
पिछड़ी हुई बाते हैं 
तुम्हारे लिए यह प्रेम बीती हुई सदी का नाम है 
तुम्हारे लिए यह प्रेम असभ्य प्रेम है 
फिर जब हम और तुम आमने - सामने होंगे 
तब प्रेम की बात नहीं हो सकती 
मैं और तुम जब आमने - सामने होंगे 
तब मेरी कही हुई बातें तुम्हें स्वीकार नहीं होंगी 
तो साथी 
हमारे और तुम्हारे बीच तो 
सिर्फ लड़ाई हो सकती है
संघर्ष हो सकता है 
जो एकतरफ़ा नहीं होगा 
दोनों तरफ से होगा