अधपकी-अस्पष्ट सी बातें हैं...झाड़-झंखाड़ों से भरे मेरे पहाड़ी गाँव की तरह ऊबड़-खाबड़ और बेतरतीब सी
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Monday, November 28, 2011
Saturday, October 8, 2011
'समझदारी’
पैदल चलता हूँ
तो सभी
कार, मोटरसाइकिल ,रिक्शे पे चलनेवाले
परेशानी पैदा करने वाले
जान पड़ते हैं
जब कभी
मोटरसाइकिल पर होता हूँ तो
लगता है
पैदल और रिक्शे पे
चलने वाले लोगों को
अब तक चलने की
तमीज ही नहीं आयी है
और जब कभी
किसी के साथ कार में होता हूँ
तो पैदल, रिक्शे, मोटरसाइकिल और बस पे चलने वाले
बिलकुल ढीठ प्रतीत होते हैं
मैं इतना सब कुछ समझता हूँ
और यह सब समझते हुए भी
हवाई जहाज पर चढ़ने की
हसरत रखता हूँ
Tuesday, October 4, 2011
इंसानों से सावधान
मैं बहुत चाह कर भी
कुत्तों को पसंद नहीं कर पाता
फिर अचानक
एक दिन यह सोचकर
बहुत भयभीत हो गया
कि क्या होगा उस दिन
जिस दिन
पूरे मोहल्ले में
एक भी
कुत्ता
नहीं होगा
सिर्फ इंसान ही इंसान होंगे
Wednesday, May 4, 2011
झारखण्ड के पंचायती राज व्यवस्था में आदिवासी महिलाओं का आना-निर्मला पुतुल
(पिछले दिनों दुमका में उनसे मुलाकात के समय यह लेख मुझे उन्होंने पढ़ने के लिए दिया था, इसे अब मैं उनकी अनुमति के साथ अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर रहा हूँ. ज्ञात हो कि निर्मला पुतुल खुद भी जनवरी में हुए इस पंचायत-चुनाव के मैदान में थीं, पर कुछ 'खास' कारणों से उन्हें जीत नहीं मिल पाई. इस लेख में उन 'खास' कारणों की पड़ताल हो जायेगी. झारखण्ड के पंचायती-चुनाव की चर्चा मुख्य-मीडिया में नहीं के बराबर ही रही, ऐसे में यह लेख इस चुनाव को समझने और जानने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है. )
झारखण्ड में बत्तीस वर्षों बाद हुए पंचायत चुनाव में भारी संख्या में आदिवासी महिलाएं नेतृत्व करने के लिए उभर कर सामने आयी हैं. जो महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है. निस्संदेह यह पचास प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था लागू करने की वजह से ही संभव हो पाया.
पंचायती राज व्यवस्था में आदिवासी महिलाओं का प्रमुखता से सामने आना हम महिलाओं के लिए गौरव की बात है, परन्तु खतरा इस बात का है कि पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था में क्या आज भी हर मोर्चे पर महिलाएं व्यक्तिगत रूप से अपना फैसला स्वयं ले पायेंगी? जिस तरह चुनाव के दौरान पुरुषवादी मानसिकता से जुड़े लोगों ने खुद सीधे सत्ता में नहीं आ पाने की स्थिति में महिलाओं को प्रायोजित तौर पर सामने लाने की कोशिश की है और जब उनकी कोशिश से महिलाएं चुनाव जीत कर नेतृत्व करने आगे आई हैं तो क्या ये लोग नेतृत्व की डोर उन महिलाओं के हाथों में रहने देंगे या उसकी आड़ में उसके नाम पर अपना शासन चलाएंगे.
पंचायत चुनाव में व्यक्तिगत स्तर पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में मेरा जो अनुभव रहा उसके आधार पर लगता है कि जिस तरह से बिचौलियों ने पुरुष-सत्तात्मक व्यवस्था कायम रखने के लिए योग्य महिलाओं की जगह अयोग्य महिलाओं को अधिकाधिक संख्या में अपने राजनीतिक तिकड़म और कूटनीति की बदौलत पंचायत प्रतिनिधि के रूप में चुनकर सामने लाया है, वह जहाँ एक ओर सुखद है तो दूसरी ओर कहीं ज्यादा दुखद भी है. सुखद इस रूप में कि महिलाएं नेतृत्व में उभरकर आईं लेकिन दुख इस बात का है कि जिन योग्य महिलाओं को आना चाहिए उन्हें आने नहीं दिया गया. इससे हम महिलाओं की एकता भी खंडित होती है लेकिन अफ़सोस उन महिलाओं को इसका आभास तक नहीं हुआ. सच तो यह है कि जिन बिचौलियों की बदौलत हमारे बीच की ये महिलाएं इसमें उभर कर सामने आईं, उन बिचौलियों ने उन पर कोई एहसान नहीं किया बल्कि पंचायत स्तर पर विकास कार्यों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाने और अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए अपने हाथों की कठपुतली बनाने की मानसिकता से ऐसा किया है. क्योंकि वे बिचौलिए अच्छी तरह जानते हैं कि योग्य और सशक्त महिलाएं पंचायत का नेतृत्व संभालेंगी तो उनकी बिचौलियागिरी नहीं चलेगी. काश हमारी उन भोली-भाली महिलाओं को यह सब पता चल पाता जो आज अपनी जीत के बाद उनका गुणगान करते नहीं थक रहीं .
हमारे बीच से उभरे महिला नेतृत्व को लेकर एक और संकट इस बात का रहा कि जिस पंचायती व्यवस्था को दलगत राजनीति से अलग, एक स्वतंत्र व्यवस्था होने की बात कही जा रही थी, विडंबना है कि आज वह पूरी तरह राजनीतिक -व्यवस्था के चक्रव्यूह में फंस गई. झारखण्ड के 'धुरंधर' राजनीतिज्ञों ने जिस तरह पंचायती राज-व्यवस्था में उभर कर आये प्रतिनिधियों को लेकर शतरंज का खेल खेला है वह बहुत ही खतरनाक है. पंचायत के मुखिया से लेकर जिला परिषद के अध्यक्ष तक में जिस तरह खरीद-फरोख्त हुई उससे इसे नाम मात्र की पंचायती-राज-व्यवस्था ही कहा जा सकता है. जबकि मुख्य धारा की राजनीतिक व्यवस्था द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से अपनी सत्ता कायम रखने के लिए जिस तरह चुन-चुन कर अयोग्य व्यक्तियों को सभी महत्वपूर्ण पद पर रखा गया उससे झारखण्ड में पंचायती राज-व्यवस्था का भविष्य अंधकारमय हो सकता है. दुख इस बात का अधिक है कि इसमें बड़ी संख्या में हमारी आदिवासी महिलाएं भी हैं जो जाने-अनजाने इस चक्रव्यूह में शामिल हैं, यहाँ तक कि कुछ योग्य महिलाएं भी जिनसे बुद्धिजीवियों को बहुत उम्मीदें थीं ; वह भी अपने आप को बचा नहीं पाई.
खैर जो भी हो जैसी भी स्थितियां बने फ़िलहाल इस बात को लेकर प्रसन्नता जरुर व्यक्त की जा सकती है. इस व्यवस्था से बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाएं सामने आई हैं, जो झारखण्ड में महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक पहला ठोस कदम माना जा सकता है. अपेक्षा है तो अपने तमाम उन जनप्रतिनिधि बहनों से जिन्हें जनता ने पहली बार उभर कर सामने आने का मौका दिया है. वे मुट्ठी भर लोगों के स्वार्थ-पूर्ति से बाहर होकर जनहित में अपना फैसला लें. तभी वास्तविक रूप में सशक्त होकर अपने समाज और समुदाय का भला कर पायेंगी.
Friday, April 29, 2011
आइए हाथ उठाएं हम भी: लौट जाते हैं ये कुछ ईश्वर
सांई बाबा नाम के एक ईश्वर की मौत अभी-अभी हुई है तो इस सन्दर्भ में लाल्टू की इस कविता पढ़ा-समझा जा सकता है....
आइए हाथ उठाएं हम भी: लौट जाते हैं ये कुछ ईश्वर
आइए हाथ उठाएं हम भी: लौट जाते हैं ये कुछ ईश्वर
Sunday, January 2, 2011
कात्यायनी की एक कविता
2010 में निराशा, प्रेम, उदासी और रतजगे की कविता के बारे में कुछ राजनीतिक नोट्स
तमाम सम्मानित अग्रज कवि संक्रमण कर रहे हैं
सामाजिक दिक्-काल से कोस्मोलोजिकल दिक्-
काल में.
कबीर की ऐतिहासिक सीमाओं ने धकेला उन्हें जिस
राह पर
वही अब शरण्य बन रही है, अनिश्चिता
और खतरों से
बचकर कर्तव्य निभाने के लिए.
अपने महासंक्रमण से पहले नहीं भूले हैं कविगण
अपने सभी तमगों, प्रशस्तियों, दोपहर की नींदों
और प्रेमिकाओं के साथ बिताए गए वक्तों को
समेटना साथ ले जाने के लिए.
इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के बीतते-बीतते
द्रविड प्राणायाम से भी कठिन हो गया है
मित्रों के आग्रह के दबाव तले कविता लिखना.
हार्दिक इच्छा है कि आवारा उदास विचारों (या
वैचारिक उदासी?) की
जमा-पूंजी सरेराह चलते-चलते मिले किसी यायावर
को सौंप दी जाय.
...बीसवीं सदी में बादलों की बेटी से
हवा के प्यार की कथा
धूप और लहरों की लिपि में जब लिखी जा रही थी
तो मायकोव्स्की की गवाही शायद
यथार्थ को स्वीकार नहीं थी.
तब समय की पार झाँकने सकने वाले
हुमायून पक्षी के हठीले,
खून सने होठों से फूटकर निकलती
भविष्य सूचक सच्चाई को
अविस्मित देख रहा था अलेक्सांद्र ब्लोक.
अब महबूब से पिछली सदी जैसी
मुहब्बत की मांग करना
चीजों को दुहराने की असंभव-सी कोशिश है,
एक मिथ्याभास को जीने की
बूढ़ी, थकी हुई चाहत है.
हमें बीसवीं शताब्दी की
उंगली पकड़कर नहीं चलना है
न ही महबूब से पहले जैसी मुहब्बत की मांग करती
महबूबा पर पहले जैसी शायरी लिखनी है.
शायरी एक पुरानी खोज है जो ज़िंदगी को समझते हुए
उसे नया करती रही है और खुद भी नई होती रही है.
हमारे समय में ब्रेख्त की व्यंग्यात्मक तिक्तता
प्रश्नाकुल होकर सर के बल खड़ी हो जाती है
और एन्सेत्सबर्गर की तार्किक उदासी बन जाती है.
हम उसे सीधा करते हैं और सुदीर्घ आख्यानों के
प्रदेश से गुजरकर
उन जटिलताओं तक जाना चाहते हैं
जहाँ नई आशाओं के उत्स हैं.
...हम चीज़ों को समझने की कोशिश करते हैं
और ज्यों ही हम चीज़ों को समझते हैं,
उनसे हमारे रिश्ते बदल जाते हैं.
समझना चीज़ों को बदलने की स्वतः-सतत प्रक्रिया में
एक वांछित सचेतन हस्तक्षेप है, क्या कहें कि
समझना भी बदलना है सूक्ष्म्तर धरातल पर,
या बदलना भी समझने की कोशिश का ही एक हिस्सा है ?
चीजें बहुत बदल चुकीं हैं, पर इतना निश्चय ही नहीं
कि राज्यसत्ता, पूंजी, श्रम, उत्पीडन, रक्त, मृत्यु,
बदलाव
और उम्मीदों के अर्थ बदल चुके हों.
अभिव्यक्ति अपने नए रूपों का संधान करती हुई
कहीं यथार्थ के उद्गम से ही दूर हो गई है
और कहीं जागतिक चिन्तओं की इन्दराजी हो रही है
किसी द्वीप पर.
कहना है कुछ विचारकों का कि हमें अपनी बातों पर
बहुत बल नहीं देना चाहिए, न ही तेज स्वर में
बोलना चाहिए.
संज्ञान का सिद्धांत संभ्रम की देवी के साथ
संभोगरत है इस नयी शताब्दी में
और हम, ठोस तर्कों के साथ यह कहना चाहते हैं
कि शब्द अगर अपने कर्तव्यों से किनाराकशी करने
लगें
तो पियानों पर कोई संगीत-रचना भी
राजनीतिक घोषणा-पत्र की भूमिका निभा सकती है.
हम बताना चाहते हैं कि रक्त का सिर्फ रसायन-
शास्त्र ही नहीं,
एक सौंदर्य-शास्त्र भी होता है और उसके
काव्यात्मक-बिम्बों
का एक ऐतिहासिक आख्यान है जो हमारी स्मृतियों
का हिस्सा है.
हम इस जादू को समझना चाहते है कि
किस तरह मनुष्यता के पदचिन्हों को एक नए समय में
खोज लेते हैं हम, जबकि हमसे पहले उस समय से
किसी का भी गुज़रना नहीं होता है.
यही है शायद कल्पना का यथार्थ.
इस जादू बिना जादू संभव नहीं.
...गुज़री सदी की हारी हुई लड़ाइयों से हमने पाई हैं
कुछ चीज़ें जो अब भी हमारे पास हैं,
पर यह भी सच है कि एक अछोर उदासी भी
हमारे साथ लगातार लगी हुई है, कुछ ऐसी कि
कविता लिखने की पुरातन चाहत हम खोते जा रहे हैं.
शिद्दत के साथ और पूरी रोमानियत के साथ हम
चीज़ों को समझना चाहते थे,जीवन के बहुस्वरीय
पाठ के
सभी अर्थों तक पहुँचने में लगे रहना चाहते थे
आख़िरी सांस तक,
लेकिन एशियाई टुच्चइयों, दैनंदिन क्षुद्रताओं में
व्यर्थ होते रहे.
हम बताना चाहते थे कि जलती रोशनियों के पीछे
सिर्फ तेल ही नहीं,बल्कि जलते हुए ह्रदय भी हुआ
करते हैं.
हम राख के ढेर से बरामद नक्शों के सुबूत देना
चाहते थे.
हम बताना चाहते थे कि आँखों से सपने खुरचने की
असंभव कोशिश से जो तेजाबी खून छलकता है
वह जंगली कुत्तों को पागल कर देते है.
पर हमारी अनसुनी की जाती रही.
मायूस, हम शहर के छोर तक गए चहलकदमी करते
हुए,
जहाँ सामुद्र का उलीचा हुआ पानी निश्चल पड़ा था
सड़ती-सूखती मछलियों और काई-सिवार की गंध
के साथ.
अक्सर वहाँ
खराद के एक बंद कारखाने के सामने बैठा
एक बूढ़ा कम्युनिस्ट अपने गुजर चुके दोस्तों से
बातें कर रहा होता था.
जब हम अपनी बस्तियों की और लौटते थे,
संहार के लिए जिजीविषा की खोज करने वाले
मानव रहित ड्रोन विमान लौट चुके होते थे.
यह वह समय होता था जब सरकारें
अपनी जनता के खिलाफ देश के भीतर जंग लड़
रही होती थीं,
सलवा जुडूम के बाद राज्य का
शीर्ष पुलिस अधिकारी
एक मार्क्सवादी आलोचक की
की स्मृति में स्थापित पुरस्कार
एक मार्क्सवादी और एक गांधीवादी को
दे रहा होता था.
और यही वह समय होता था जब अचानक
टिड्डी दल की तरह
आसमान में छा जाती थीं शक्तिशाली देशों की मुद्राएँ,
और फिर वो जलने लगती थीं और राख की बारिश
होने लगती थी.
...गुज़री सदी में हमने काफी कुछ पाया और फिर
खो दिया.
बावजूद इसके, हम जानते हैं कि स्मृतियों, अनुभव,
और तर्क कीसंचित निधि के सहारे हम बेहतर सपने
देख सकते हैं.
बेहतर परियोजना बना सकते हैं, बेहतर ढंग से
प्यार कर सकते हैं और बेहतर ढंग से
एक बेहतर दुनिया के लिए लड़ सकते हैं.
पर यह जानना हमें राहत नहीं देता फ़िलहाल.
उदास की मीनार से हम देखते हैं निस्सीम जलराशि,
किनारे पर पछाड़ खाती लहरें और स्वीकारते हैं
अकुंठ भाव से इस समय की अपनी निरुपाय निराशा.
जिस सक्रिय विचार कि उपस्थिति मात्र में है
भविष्य का इतना सघन अहसास
कि वर्तमान और अधिक बोझिल होने लगता है,
हम उस आगमन की प्रतीक्षा करते हैं
और बूढ़े होने से बचे रहते हैं.
Saturday, December 25, 2010
शीर्षक विहीन दो कवितायें
1. उसे आश्चर्य होता है
यहाँ हर दरवाजे पर
अखबार देख कर
वह कहता है
आज भी
उसका गांव
एक ही अखबार
पढ़ता है
2. मेरी गरीबी
मुझमें
आगे बढ़ने का
हौसला भरती है
पर
अमीर बनने का शौक
मुझे हर बार
पीछे धकेल
देता है
यहाँ हर दरवाजे पर
अखबार देख कर
वह कहता है
आज भी
उसका गांव
एक ही अखबार
पढ़ता है
2. मेरी गरीबी
मुझमें
आगे बढ़ने का
हौसला भरती है
पर
अमीर बनने का शौक
मुझे हर बार
पीछे धकेल
देता है
Monday, November 29, 2010
Saturday, November 27, 2010
आखिर क्यों महबूबाएं चाँद जैसी लगती हैं?
जो चाँद स्त्रियों को भाई सामान लगता है,जिस कारण वह बचपन से हमारा मामा हो जाता है,वही चाँद पुरुषों को महबूबा की तरह लगता और दीखता है.मुझे तो लगता है कि यह भी एक पुरुष-प्रधान-पितृसत्तात्मक-समाज की ही निर्मिति है. यह आज के समय के समाज में भी उतना ही फिट है जितना यह पहले के ज्यादा सामंती समाज(क्योंकि अब भी सामंतवादी मानसिकता से हम कहाँ मुक्त हो पायें हैं) में था.अब चाँद मौजूद तो दिन में भी होता है...पर सूरज की रोशनी के कारण अपनी रोशनी से हमें अपनी और आकृष्ट नहीं कर पाता.ऐसा नहीं है को वो हमें नजर नहीं आता है,पर वह हमें तब न सुन्दर लगता है और न महबूबा सा महसूस होता है. दिन में उसे देख कर न दिल में कोई उमंग उठती है और न ही हम उसाँसे भरते हैं.मतलब इस बात से यह सिद्ध होता है कि महबूबा चाँद की तरह नहीं होती बल्कि रात के चाँद की तरह होती है.
रात की चाँद रात भर चांदनी बिखेरता है और सुबह होते ही महत्वहीन हो जाता है. इस चाँद की तरह का होने का मतलब है कि इसी तरह स्त्री को भी होना चाहिए वह चाहे महबूबा हो या पत्नी.जो दिन में दिख कर भी नहीं दिखने जैसी हो, पर रात होते ही अपनी पूरी चांदनी के साथ मौजूद रहे...रात भर रहे और सुबह होते ही चली जाये यानी होकर भी महत्वहीन हो जाये.
कहने का मतलब है कि हमें उन सारे सामाजिक निर्मितियों को फिर से जांचना-परखना होगा,जिसे हम सहज तरीके से मान लेते रहे हैं.जैसे ऐसी ही एक और बात जिसका इस्तेमाल पुरुष अपनी प्रेमिका,पत्नी,दोस्त के साथ करता ही रहता है...इस बात को भी सामाजिक मान्यता प्राप्त है,कि "रूठने के बाद स्त्री और हसीन हो जाती है". मैं कभी नहीं समझ पाया कि ऐसा कैसे हो सकता है? कोई दुखी हो,नाराज़ हो और वो आपको सुन्दर दीखता हो. इसका सीधा सा मतलब है कि स्त्रियों को नाराज़ होने का कोई अधिकार नहीं.अगर वे नाराज होती भी हैं तो हों अपनी बाला से. खुद समझे और खुद भुगतें. यह टालने का तरीका नहीं तो और क्या है? ऐसे ही कई बातें है जो धीरे-धीरे हमारे अंदर धंसा दी जाती हैं...और चले आ रहे सामाजिक सिस्टम का हम भी हिस्सा बन जाते हैं. मैं अपनी बात एक चुटकुले से खत्म करता हूँ , जो एक शानदार कमेन्ट भी है -
"टीचर- ए फॉर
स्टूडेंट- एप्पल
टीचर- जोर से बोलो
स्टूडेंट- जय माता दी."
रात की चाँद रात भर चांदनी बिखेरता है और सुबह होते ही महत्वहीन हो जाता है. इस चाँद की तरह का होने का मतलब है कि इसी तरह स्त्री को भी होना चाहिए वह चाहे महबूबा हो या पत्नी.जो दिन में दिख कर भी नहीं दिखने जैसी हो, पर रात होते ही अपनी पूरी चांदनी के साथ मौजूद रहे...रात भर रहे और सुबह होते ही चली जाये यानी होकर भी महत्वहीन हो जाये.
कहने का मतलब है कि हमें उन सारे सामाजिक निर्मितियों को फिर से जांचना-परखना होगा,जिसे हम सहज तरीके से मान लेते रहे हैं.जैसे ऐसी ही एक और बात जिसका इस्तेमाल पुरुष अपनी प्रेमिका,पत्नी,दोस्त के साथ करता ही रहता है...इस बात को भी सामाजिक मान्यता प्राप्त है,कि "रूठने के बाद स्त्री और हसीन हो जाती है". मैं कभी नहीं समझ पाया कि ऐसा कैसे हो सकता है? कोई दुखी हो,नाराज़ हो और वो आपको सुन्दर दीखता हो. इसका सीधा सा मतलब है कि स्त्रियों को नाराज़ होने का कोई अधिकार नहीं.अगर वे नाराज होती भी हैं तो हों अपनी बाला से. खुद समझे और खुद भुगतें. यह टालने का तरीका नहीं तो और क्या है? ऐसे ही कई बातें है जो धीरे-धीरे हमारे अंदर धंसा दी जाती हैं...और चले आ रहे सामाजिक सिस्टम का हम भी हिस्सा बन जाते हैं. मैं अपनी बात एक चुटकुले से खत्म करता हूँ , जो एक शानदार कमेन्ट भी है -
"टीचर- ए फॉर
स्टूडेंट- एप्पल
टीचर- जोर से बोलो
स्टूडेंट- जय माता दी."
Sunday, May 17, 2009
बलात्कार हत्या से बड़ा 'पाप'
(१)
बलात्कार
अगर हत्या से बड़ा पाप होता
तो कई मठ-मंदिर
महाविद्यालय-विश्वविद्यालय
और कई कई प्रतिष्ठान
टूट कर बिखर जाते
और कई इंसानी चेहरे
कुत्तों में तब्दील हो जाते
(२)
बलात्कार
सही में हत्या से बड़ा पाप होता है
इसलिए
वो लड़की
इस 'पाप' को ढोती
न जी पाती है
न मर पाती है
(३)
बलात्कार
जिस दिन हत्या से बड़ा पाप करार दिया गया था
उस दिन
पूजा करने वालों कि तादाद में
बेतहाशा वृद्धि हो गयी थी
(३)
'बलात्कार के बाद की आत्मीयता' से
उपजा हुआ मुहावरा मात्र है
'बलात्कार हत्या से बड़ा पाप होता है'
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